भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 और राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व (Directive Principles of State Policy—DPSP) परस्पर पूरक हैं। जहाँ अनुच्छेद 21 व्यक्ति के जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है, वहीं नीति-निर्देशक तत्त्व सामाजिक एवं आर्थिक न्याय पर आधारित कल्याणकारी राज्य की स्थापना का लक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।

संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार, नीति-निर्देशक तत्त्व न्यायालय द्वारा सीधे प्रवर्तनीय नहीं हैं, किंतु देश के शासन में मौलिक महत्त्व रखते हैं और राज्य का कर्तव्य है कि कानून निर्माण में इन्हें लागू करे।  सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की व्यापक और उदार व्याख्या करके अनेक नीति-निर्देशक तत्त्वों में निहित सामाजिक-आर्थिक उद्देश्यों को मौलिक अधिकारों का संरक्षण प्रदान किया।

इस प्रकार अनुच्छेद 21 ने DPSP को केवल शासन के आदर्शों तक सीमित न रखकर उनके अनेक उद्देश्यों को न्यायिक रूप से संरक्षित अधिकारों में विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

नीति–निर्देशक तत्त्वअनुच्छेद 21 द्वारा प्रभावशीलताप्रमुख न्यायिक निर्णय
अनुच्छेद 39(a), 41 — आजीविका और काम के अवसरजीवन के अधिकार में आजीविका के संरक्षण को शामिल किया गया।Olga Tellis बनाम Bombay Municipal Corporation, 1985
अनुच्छेद 41, पूर्ववर्ती 45, 46 — शिक्षाशिक्षा को अनुच्छेद 21 से जोड़ा गया; आगे अनुच्छेद 21A जोड़ा गया।Unni Krishnan बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, 1993
अनुच्छेद 47 — पोषण, जीवन स्तर और लोक स्वास्थ्यस्वास्थ्य एवं आवश्यक चिकित्सा के संरक्षण को जीवन के अधिकार से जोड़ा गया।Paschim Banga Khet Mazdoor Samity बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 1996
अनुच्छेद 48A — पर्यावरण संरक्षणप्रदूषणमुक्त जल और वायु को जीवन के अधिकार का भाग माना गया।Subhash Kumar बनाम बिहार राज्य, 1991
अनुच्छेद 39A — समान न्याय एवं निःशुल्क विधिक सहायताआवश्यक परिस्थितियों में निर्धन अभियुक्तों के लिए निःशुल्क कानूनी सहायता को मौलिक अधिकार से जोड़ा गया।Hussainara Khatoon बनाम बिहार राज्य, 1979

इन उदाहरणों का आधार संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय हैं।

(A) शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाना

  • Unni Krishnan बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1993) सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की व्याख्या अनुच्छेद 41, तत्कालीन अनुच्छेद 45 तथा अनुच्छेद 46 के आलोक में की और 14 वर्ष तक के बच्चों की निःशुल्क शिक्षा को मौलिक अधिकार माना। इसके पश्चात 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा अनुच्छेद 21A जोड़ा गया, जिसके अंतर्गत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों की निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा मौलिक अधिकार बनी। 

प्रभाव: शिक्षा संबंधी नीति-निर्देशक लक्ष्य को स्पष्ट मौलिक अधिकार का संवैधानिक दर्जा मिला।

(B) आजीविका के अधिकार को संरक्षण

  • Olga Tellis बनाम बॉम्बे नगर निगम (1985) न्यायालय ने अनुच्छेद 39(a) और 41 की सहायता से अनुच्छेद 21 का विस्तार करते हुए आजीविका के अधिकार को जीवन के अधिकार का अभिन्न भाग माना।
  • इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति को राज्य से नौकरी प्राप्त करने का असीमित मौलिक अधिकार मिल गया। इसका आशय है कि आजीविका से वंचित करने वाली राज्य की कार्रवाई न्यायसंगत और विधिसम्मत प्रक्रिया के अधीन होगी।

 (C) स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी सुरक्षा

  • Paschim Banga Khet Mazdoor Samity बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1996) न्यायालय ने कहा कि सरकारी अस्पतालों द्वारा आवश्यक और समय पर चिकित्सा उपलब्ध कराने में विफलता अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो सकती है। इसने अनुच्छेद 47 के लोक स्वास्थ्य संबंधी उद्देश्य को संवैधानिक संरक्षण दिया।
  • इसके अतिरिक्त PUCL बनाम भारत संघ (2001 से संबंधित खाद्य अधिकार वाद) में न्यायिक आदेशों ने खाद्य सुरक्षा योजनाओं के क्रियान्वयन को बल दिया।

 (D) आवास और गरिमापूर्ण जीवन

Chameli Singh बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1995) न्यायालय ने आवास को गरिमापूर्ण जीवन का महत्त्वपूर्ण घटक माना और सामाजिक-आर्थिक न्याय से संबंधित नीति-निर्देशक तत्त्वों की सहायता ली।

 (E) कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा

Vishaka बनाम राजस्थान राज्य (1997) सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 14, 19 और 21 तथा अनुच्छेद 42 के मानवीय कार्यदशाओं के उद्देश्य के अनुरूप कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने के लिए दिशा-निर्देश दिए।

  1. न्यायिक संरक्षण: अनुच्छेद 21 से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन होने पर अनुच्छेद 32 एवं 226 के अंतर्गत न्यायिक उपचार उपलब्ध होता है।
  2. कल्याणकारी राज्य की स्थापना: राज्य के उत्तरदायित्व को केवल हस्तक्षेप न करने तक सीमित न रखकर कुछ सकारात्मक संरक्षणात्मक दायित्वों तक विस्तारित किया।
  3. सामाजिक–आर्थिक न्याय: स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका और गरिमा जैसे मुद्दों को संवैधानिक अधिकार-विमर्श का हिस्सा बनाया।
  4. विधायी सुधार: शिक्षा के अधिकार जैसे क्षेत्रों में न्यायिक व्याख्या ने संवैधानिक एवं वैधानिक विकास को दिशा दी।
  5. संविधान की जीवंतता: जीवन के अधिकार की व्याख्या बदलती सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार विकसित हुई।

नहीं। अनुच्छेद 21 ने अनेक नीति-निर्देशक उद्देश्यों को प्रभावी अवश्य बनाया, लेकिन सभी नीति-निर्देशक तत्त्व स्वतः न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हो गए।

इस संबंध में तीन सीमाएँ महत्त्वपूर्ण हैं:

  • अनुच्छेद 37 के अंतर्गत DPSP की मूलतः अप्रवर्तनीय प्रकृति बनी हुई है।
  • स्वास्थ्य, रोजगार और आवास जैसे अधिकारों के कुछ पहलुओं का क्रियान्वयन उपलब्ध संसाधनों, कानूनों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
  • नीति निर्माण का प्राथमिक दायित्व विधायिका एवं कार्यपालिका का है; न्यायिक हस्तक्षेप संवैधानिक सीमाओं के अधीन रहता है।

Minerva Mills बनाम भारत संघ (1980) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक तत्त्वों के बीच सामंजस्य एवं संतुलन संविधान की मूल संरचना का आवश्यक अंग है।

अनुच्छेद 21 ने राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्वों को प्रभावी बनाने में एक संवैधानिक सेतु का कार्य किया है। इसने जीवन के अधिकार को केवल भौतिक अस्तित्व तक सीमित न रखकर शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, आजीविका और मानवीय गरिमा से जोड़ दिया।

अनुच्छेद 21 ने नीति-निर्देशक तत्त्वों को सामूहिक रूप से मौलिक अधिकारों में परिवर्तित नहीं किया, बल्कि उनके अनेक सामाजिक-आर्थिक उद्देश्यों को न्यायिक संरक्षण देकर भारतीय संविधान के राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र की दिशा में आगे बढ़ाया है।

इसलिए कहा जा सकता है कि नीति-निर्देशक तत्त्व कल्याणकारी राज्य के लक्ष्य निर्धारित करते हैं, जबकि अनुच्छेद 21 उन लक्ष्यों के अनेक पहलुओं को अधिकार-आधारित संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है।

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