1. भूमिका (Introduction)
21वीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक परिवर्तन से गुजर रही है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच विकसित द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था तथा 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद उभरी अमेरिकी प्रभुत्व वाली एकध्रुवीय व्यवस्था के स्थान पर अब अनेक शक्ति-केंद्रों के उदय की प्रक्रिया दिखाई दे रही है।
चीन की बढ़ती आर्थिक एवं सैन्य क्षमता, भारत का आर्थिक तथा कूटनीतिक उदय, रूस की सामरिक सक्रियता, यूरोपीय संघ की आर्थिक शक्ति, ब्रिक्स का विस्तार और ग्लोबल साउथ की बढ़ती भागीदारी इस परिवर्तन के प्रमुख संकेत हैं।
बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था केवल शक्ति के पुनर्वितरण की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि वैश्विक शासन, आर्थिक संसाधनों, तकनीकी क्षमताओं और अंतरराष्ट्रीय निर्णय-निर्माण में अधिक भागीदारी की आकांक्षा से भी संबंधित है।
2025 की Munich Security Report, जिसका शीर्षक Multipolarization था, ने स्पष्ट किया कि विश्व में नए शक्ति-केंद्रों का उदय हो रहा है, लेकिन इसके साथ अंतरराष्ट्रीय ध्रुवीकरण तथा प्रतिस्पर्धा भी बढ़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार अभी पूरी तरह स्थापित बहुध्रुवीय व्यवस्था की बात करना विवादास्पद है; विश्व बहुध्रुवीयता की ओर संक्रमण की स्थिति में है।
2. बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का अर्थ एवं परिभाषा
बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World Order) से आशय ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से है जिसमें वैश्विक राजनीतिक, आर्थिक, सैन्य, तकनीकी एवं कूटनीतिक शक्ति किसी एक या दो देशों तक सीमित न रहकर तीन या उससे अधिक प्रमुख शक्ति-केंद्रों के बीच वितरित होती है।
इस व्यवस्था में विभिन्न देश तथा क्षेत्रीय संगठन अंतरराष्ट्रीय निर्णयों को प्रभावित करने की पर्याप्त क्षमता रखते हैं।
बहुध्रुवीय व्यवस्था की मूल विशेषताएँ
- शक्ति का विकेंद्रीकरण: किसी एक देश का पूर्ण वर्चस्व न होना।
- अनेक वैश्विक शक्ति-केंद्र: अमेरिका, चीन, भारत, यूरोपीय संघ, रूस आदि का विभिन्न क्षेत्रों में प्रभाव।
- शक्ति-संतुलन (Balance of Power): एक शक्ति के अत्यधिक प्रभुत्व को अन्य शक्तियों द्वारा संतुलित करने की संभावना।
- रणनीतिक स्वायत्तता: देशों के लिए स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने के अधिक विकल्प।
- बहुपक्षीय सहयोग: विभिन्न देशों और संस्थाओं के बीच साझा निर्णय-निर्माण।
- परस्पर निर्भरता: व्यापार, ऊर्जा, वित्त, तकनीक और आपूर्ति शृंखलाओं में व्यापक संबंध।
- प्रतिस्पर्धा एवं सहयोग का सह-अस्तित्व: एक ही देश के साथ कुछ क्षेत्रों में सहयोग और अन्य क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा संभव।
3. विश्व व्यवस्था का ऐतिहासिक विकास
- 1648–1815: आधुनिक संप्रभु राज्य व्यवस्था का विकास :- वेस्टफेलिया की संधि के बाद यूरोप में राज्य-संप्रभुता की अवधारणा मजबूत हुई। यूरोपीय शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा और शक्ति-संतुलन का विकास हुआ।
- 1815–1914: यूरोपीय बहुध्रुवीयता :- ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, प्रशा/जर्मनी और ऑस्ट्रिया जैसी शक्तियाँ यूरोपीय राजनीति को प्रभावित करती थीं। 1815 का Concert of Europe इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
- 1914–1945: विश्वयुद्ध और व्यवस्था का संकट :- शक्ति-प्रतिस्पर्धा, साम्राज्यवाद, आर्थिक संकट और असफल सामूहिक सुरक्षा ने अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता को बढ़ाया।
- 1945–1991: द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था :- अमेरिका के नेतृत्व में पूँजीवादी गुट और सोवियत संघ के नेतृत्व में समाजवादी गुट का उदय। NATO, वारसा संधि और शीतयुद्ध प्रमुख विशेषताएँ रहीं।
- 1991–2008: अमेरिकी प्रभुत्व का दौर :- सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका प्रमुख वैश्विक सैन्य शक्ति बना रहा। वैश्वीकरण और अमेरिकी नेतृत्व वाली संस्थाओं का प्रभाव बढ़ा।
- 2008–2020: बहुध्रुवीयता के संकेत :- वैश्विक वित्तीय संकट, चीन की आर्थिक प्रगति, G20 की बढ़ती भूमिका, ब्रिक्स का संस्थागत विकास और विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियों का उदय।
- 2020–2026: बहुध्रुवीकरण एवं भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा :- अमेरिका-चीन तकनीकी एवं आर्थिक प्रतिस्पर्धा, रूस-यूक्रेन युद्ध, आपूर्ति शृंखला पुनर्गठन, ब्रिक्स विस्तार तथा ग्लोबल साउथ की बढ़ती सक्रियता।
| विश्व व्यवस्था स्थिर नहीं रहती। आर्थिक उत्पादन, तकनीकी विकास, सैन्य क्षमता, राजनीतिक संस्थाओं और गठबंधनों में परिवर्तन के कारण विश्व की शक्ति-संरचना भी बदलती रहती है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि एकध्रुवीयता सीधे एक पूर्ण बहुध्रुवीय व्यवस्था में बदल जाए। संक्रमण के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग शक्ति-संरचनाएँ एक साथ उपस्थित हो सकती हैं। |
4. बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के उदय के प्रमुख कारण
4.1 अमेरिका के सापेक्ष एकध्रुवीय प्रभुत्व में परिवर्तन
- 1991 के बाद अमेरिका विश्व की प्रमुख सैन्य, आर्थिक और तकनीकी शक्ति के रूप में उभरा। किंतु समय के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था और तकनीकी क्षमताओं में अन्य देशों की हिस्सेदारी बढ़ती गई।
- 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट, लंबे सैन्य अभियानों की लागत, चीन की आर्थिक प्रगति और विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियों के उभार ने अमेरिका की निर्विवाद प्रभुत्वकारी स्थिति को चुनौती दी।
- अमेरिकी प्रभुत्व के सापेक्ष कमी का अर्थ अमेरिका का कमजोर या अप्रासंगिक हो जाना नहीं है। उसकी सैन्य, वित्तीय, तकनीकी और संस्थागत शक्ति अब भी अत्यंत व्यापक है।
4.2 चीन का आर्थिक एवं सामरिक उदय
- चीन विश्व राजनीति में आर्थिक उत्पादन, विनिर्माण, निर्यात, अवसंरचना निवेश और सैन्य आधुनिकीकरण का प्रमुख केंद्र बन चुका है।
- चीन का प्रभाव निम्नलिखित माध्यमों से दिखाई देता है:
- बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI)
- एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB)
- वैश्विक विनिर्माण और आपूर्ति शृंखलाएँ
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सैन्य एवं समुद्री सक्रियता
- उभरती तकनीकों और महत्त्वपूर्ण खनिजों में भूमिका
चीन के उदय ने अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा को समकालीन वैश्विक शक्ति-संरचना का महत्त्वपूर्ण तत्व बनाया है।
4.3 भारत का उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में विकास
- भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था, विशाल घरेलू बाजार, जनसांख्यिकीय क्षमता, डिजिटल प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष कार्यक्रम और स्वतंत्र विदेश नीति वैश्विक शक्ति-वितरण में उसकी भूमिका का विस्तार करते हैं।
- भारत एक ओर ब्रिक्स एवं SCO के माध्यम से यूरेशियाई तथा ग्लोबल साउथ सहयोग में भाग लेता है, वहीं दूसरी ओर क्वाड, G20 और विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ साझेदारियाँ भी बढ़ाता है।
4.4 रूस का सामरिक प्रभाव
- रूस परमाणु हथियारों, ऊर्जा संसाधनों, सैन्य क्षमताओं और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के कारण प्रमुख सामरिक शक्ति है।
- रूस-यूक्रेन युद्ध ने रूस तथा पश्चिमी देशों के बीच तनाव को बढ़ाया और यूरोप की सुरक्षा संरचना, ऊर्जा व्यापार तथा अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों को प्रभावित किया। यह घटनाक्रम दिखाता है कि बहुध्रुवीयता में सामरिक प्रतिस्पर्धा भी बढ़ सकती है।
4.5 यूरोपीय संघ की भूमिका
- यूरोपीय संघ एक स्वतंत्र संप्रभु देश नहीं, बल्कि सदस्य देशों का राजनीतिक-आर्थिक संगठन है। इसके बावजूद वह वैश्विक बाजार, व्यापार नियमों, पर्यावरणीय मानकों और तकनीकी विनियमन में महत्त्वपूर्ण शक्ति-केंद्र के रूप में कार्य करता है। उसकी विशेषता Regulatory Power है, अर्थात् अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तकनीक संबंधी नियमों को प्रभावित करने की क्षमता।
4.6 ग्लोबल साउथ का उभार
- एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक विकासशील देशों की अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रियता बढ़ी है।
- ये देश अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार, विकास वित्त, ऋण राहत, जलवायु न्याय और तकनीकी हस्तांतरण की माँग करते हैं।
4.7 वैश्वीकरण एवं तकनीकी परिवर्तन
- वैश्वीकरण ने उत्पादन, निवेश, डिजिटल सेवाओं और व्यापार नेटवर्क को अनेक देशों में फैलाया। AI, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष तकनीक और महत्त्वपूर्ण खनिजों ने शक्ति के नए स्रोत उत्पन्न किए हैं। इससे विश्व राजनीति का स्वरूप केवल सैनिक शक्ति पर आधारित नहीं रह गया है।
5. बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के प्रमुख आयाम
| आयाम | प्रमुख विशेषता | उदाहरण |
| राजनीतिक | वैश्विक निर्णयों में अनेक देशों की भूमिका | G20, BRICS, संयुक्त राष्ट्र |
| आर्थिक | उत्पादन, व्यापार एवं निवेश का अनेक क्षेत्रों में विस्तार | अमेरिका, चीन, भारत, यूरोपीय संघ |
| सामरिक | सैन्य शक्ति तथा सुरक्षा संबंधी प्रभाव का वितरण | अमेरिका, चीन, रूस, भारत एवं क्षेत्रीय गठबंधन |
| वित्तीय | वित्तपोषण और भुगतान के विभिन्न विकल्प | IMF, विश्व बैंक, NDB, AIIB |
| तकनीकी | AI, डिजिटल प्रौद्योगिकी और सेमीकंडक्टर की प्रतिस्पर्धा | अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ तथा अन्य तकनीकी अर्थव्यवस्थाएँ |
| ऊर्जा | तेल, गैस, नवीकरणीय ऊर्जा और खनिज संसाधनों का महत्त्व | पश्चिम एशिया, रूस, अमेरिका, चीन |
| सांस्कृतिक | भाषा, मीडिया, शिक्षा और सांस्कृतिक प्रभाव | सॉफ्ट पावर और सांस्कृतिक कूटनीति |
| संस्थागत | अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की माँग | UNSC, IMF और विश्व बैंक सुधार |
वर्तमान विश्व के प्रमुख शक्ति-केंद्र

6. क्या वर्तमान विश्व वास्तव में बहुध्रुवीय बन चुका है?
यह अंतरराष्ट्रीय संबंध का एक महत्त्वपूर्ण विश्लेषणात्मक प्रश्न है। विश्व की कुछ व्यवस्थाओं में बहुध्रुवीयता बढ़ रही है, लेकिन अन्य क्षेत्रों में अभी भी शक्ति का अत्यधिक संकेंद्रण मौजूद है।
सैन्य शक्ति के उदाहरण से समझिए

SIPRI
$2.887 ट्रिलियन 2025 का वैश्विक सैन्य व्यय 58% पाँच प्रमुख देशों की संयुक्त हिस्सेदारी
इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि सैन्य शक्ति अत्यंत असमान रूप से वितरित है। अमेरिका और चीन के बीच भी सैन्य व्यय में बड़ा अंतर है।
विश्व में शक्ति-केंद्रों की संख्या बढ़ना और उनकी शक्ति का समान होना दो अलग बातें हैं। इसलिए वर्तमान विश्व को निम्नलिखित रूपों में समझा जा सकता है:
- सैन्य दृष्टि से: अमेरिकी प्रधानता के साथ अन्य प्रमुख सैन्य शक्तियाँ।
- आर्थिक दृष्टि से: कई बड़े आर्थिक केंद्रों की उपस्थिति।
- तकनीकी दृष्टि से: अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के साथ अन्य देशों की विशिष्ट तकनीकी क्षमताएँ।
- कूटनीतिक दृष्टि से: अनेक देश और समूह अंतरराष्ट्रीय निर्णयों को प्रभावित करते हैं।
अतः वर्तमान व्यवस्था को बहुध्रुवीकरण की प्रक्रिया (Process of Multipolarization) कहना एक अधिक सावधान विश्लेषण है।
7. बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था से संबंधित प्रमुख राजनीतिक विचारक
| विचारक | प्रमुख पुस्तक/लेख | बहुध्रुवीयता से संबंध |
| हंस जे. मॉर्गेन्थाऊ | Politics Among Nations (1948) | शक्ति-संतुलन और राष्ट्रीय हित |
| केनेथ वॉल्ट्ज | Theory of International Politics (1979) | अंतरराष्ट्रीय संरचना और ध्रुवीयता; द्विध्रुवीय स्थिरता पर बल |
| जॉन मियर्सहाइमर | The Tragedy of Great Power Politics (2001) | महान शक्तियों के बीच सुरक्षा प्रतिस्पर्धा |
| सैमुअल पी. हंटिंगटन | The Lonely Superpower (1999) | एक-बहुध्रुवीय व्यवस्था (Uni-multipolarity) |
| रॉबर्ट कीओहेन | After Hegemony (1984) | किसी एक प्रभुत्वकारी शक्ति के बिना भी संस्थागत सहयोग संभव |
| अमितव आचार्य | The End of American World Order (2014) | पश्चिम-केंद्रित व्यवस्था से अधिक विविध वैश्विक व्यवस्था की ओर परिवर्तन |
| रिचर्ड हास | The Age of Nonpolarity (2008) | शक्ति का देशों के अतिरिक्त अनेक गैर-राज्य अभिनेताओं में प्रसार |
(A) केनेथ वॉल्ट्ज का दृष्टिकोण
- केनेथ वॉल्ट्ज के संरचनात्मक यथार्थवाद के अनुसार अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राज्यों का व्यवहार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की अराजक संरचना तथा शक्तियों के वितरण से प्रभावित होता है।
- उन्होंने द्विध्रुवीय व्यवस्था को बहुध्रुवीय व्यवस्था की तुलना में अधिक स्थिर माना। उनके अनुसार बहुध्रुवीयता में गठबंधनों की अनिश्चितता, प्रतिद्वंद्वियों की पहचान संबंधी अस्पष्टता और गलत आकलन का जोखिम बढ़ सकता है।
(B) सैमुअल हंटिंगटन का दृष्टिकोण
- हंटिंगटन ने 1999 के अपने लेख The Lonely Superpower में शीतयुद्ध के बाद विकसित विश्व को पूर्ण एकध्रुवीय व्यवस्था के बजाय Uni-multipolar System के रूप में समझाया।
- इसमें अमेरिका एकमात्र महाशक्ति था, लेकिन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय शक्तियाँ भी वैश्विक राजनीति को प्रभावित करती थीं।
(C) अमितव आचार्य का Multiplex World Order
- अमितव आचार्य ने Multiplex World Order की अवधारणा प्रस्तुत की। उनके अनुसार 21वीं सदी की व्यवस्था केवल अनेक बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि इसमें विभिन्न सभ्यताएँ, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ, क्षेत्रीय संगठन, गैर-राज्य अभिनेता तथा अलग-अलग विकास मॉडल भी भूमिका निभाते हैं।
- उन्होंने इस विचार को 2017 के लेख After Liberal Hegemony: The Advent of a Multiplex World Order में विकसित किया।
8. बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का महत्त्व एवं संभावित लाभ
8.1 अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन :- कई प्रभावशाली शक्तियों की उपस्थिति किसी एक शक्ति के एकतरफा निर्णयों को सीमित कर सकती है। छोटे तथा मध्यम आकार के देशों को विभिन्न शक्तियों के साथ संबंध बनाने के अधिक विकल्प मिलते हैं।
8.2 वैश्विक शासन का लोकतंत्रीकरण :- अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उभरते देशों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की माँग मजबूत होती है। 22 सितंबर 2024 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा अपनाए गए Pact for the Future में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने तथा विकासशील देशों की वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में भूमिका बढ़ाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई।
8.3 विकासशील देशों को अधिक अवसर :- बहुध्रुवीयता विकासशील देशों को निवेश, अवसंरचना विकास, तकनीकी साझेदारी और अंतरराष्ट्रीय वित्त के विभिन्न स्रोत उपलब्ध करा सकती है। इसके माध्यम से ग्लोबल साउथ के देशों की सामूहिक सौदेबाजी की क्षमता बढ़ सकती है।
8.4 स्वतंत्र विदेश नीति का विस्तार :- देश अंतरराष्ट्रीय संबंधों में किसी एक गुट पर पूर्ण निर्भर रहने के बजाय विभिन्न भागीदारों के साथ सहयोग कर सकते हैं। उदाहरण के लिए भारत अमेरिका के साथ तकनीकी एवं सुरक्षा सहयोग, रूस के साथ रक्षा एवं ऊर्जा संबंध और यूरोपीय संघ के साथ व्यापारिक साझेदारी विकसित करता है।
8.5 आर्थिक एवं तकनीकी विविधीकरण:- बहुध्रुवीय व्यवस्था में विभिन्न उत्पादन केंद्रों, निवेश स्रोतों और तकनीकी नेटवर्कों के विकास की संभावना बढ़ती है।इससे किसी एक बाजार, मुद्रा, तकनीक या आपूर्ति शृंखला पर अत्यधिक निर्भरता कम करने में सहायता मिल सकती है।
8.6 जलवायु न्याय एवं सतत विकास :- विकासशील देशों की आवाज मजबूत होने से जलवायु वित्त, तकनीकी हस्तांतरण तथा साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व जैसे मुद्दे वैश्विक चर्चा में अधिक स्थान प्राप्त कर सकते हैं।
9. बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की प्रमुख चुनौतियाँ
| चुनौती | प्रभाव एवं उदाहरण |
| महान शक्तियों की प्रतिस्पर्धा | अमेरिका-चीन के बीच तकनीकी, व्यापारिक तथा सुरक्षा संबंधी तनाव |
| शक्ति-संतुलन की अनिश्चितता | बदलते गठबंधनों के कारण सुरक्षा संबंधी गलत आकलन |
| नए शीतयुद्ध की आशंका | प्रतिस्पर्धी गुटों और रणनीतिक अविश्वास का विस्तार |
| आर्थिक विखंडन | संरक्षणवाद, प्रतिबंध और अलग-अलग व्यापार नेटवर्क |
| वैश्विक संस्थाओं की अक्षमता | सुरक्षा परिषद में प्रमुख शक्तियों के मतभेद तथा वीटो |
| हथियारों की प्रतिस्पर्धा | सैन्य बजट, परमाणु आधुनिकीकरण और नई सैन्य तकनीकों का विकास |
| छोटे देशों पर दबाव | प्रतिद्वंद्वी शक्तियों के बीच पक्ष चुनने की चुनौती |
| तकनीकी विभाजन | डिजिटल मानकों, AI और सेमीकंडक्टर की आपूर्ति शृंखलाओं में प्रतिस्पर्धा |
बहुध्रुवीयता के संबंध में तीन आलोचनात्मक प्रश्न
- पहला: क्या बहुध्रुवीय व्यवस्था अधिक शांतिपूर्ण होगी? आवश्यक नहीं। शक्ति-संतुलन किसी एक शक्ति के विस्तार को रोक सकता है, लेकिन अधिक शक्ति-केंद्रों के बीच गठबंधन और प्रतिद्वंद्विता संघर्ष की आशंका भी बढ़ा सकते हैं।
- दूसरा: क्या बहुध्रुवीयता विकासशील देशों के लिए सदैव लाभकारी होगी? इससे विकल्प बढ़ सकते हैं, लेकिन कई बड़े देशों के बीच प्रतिस्पर्धा विकासशील देशों को आर्थिक एवं सामरिक दबाव में भी ला सकती है।
- तीसरा: क्या बहुध्रुवीयता अपने आप अधिक न्यायसंगत व्यवस्था निर्मित करेगी? नहीं। राजनीतिक शक्ति का वितरण और संस्थागत न्याय अलग-अलग विषय हैं। न्यायपूर्ण व्यवस्था के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून, प्रभावी संस्थाएँ, समान अवसर और जवाबदेही आवश्यक हैं।
इसलिए बहुध्रुवीय व्यवस्था की सफलता केवल शक्तियों की संख्या नहीं, बल्कि उनके परस्पर व्यवहार तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्रभावशीलता पर निर्भर करेगी।
10. बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और BRICS 2026
12–13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने वैश्विक शासन में व्यापक प्रतिनिधित्व, बहुपक्षवाद और बहुध्रुवीयता को स्पष्ट समर्थन दिया।
नई दिल्ली घोषणापत्र के अनुच्छेद 7 में अधिक न्यायसंगत और प्रतिनिधित्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तथा संयुक्त राष्ट्र के केंद्रीय महत्त्व को रेखांकित किया गया। अनुच्छेद 10 में विकासशील देशों के लिए बहुध्रुवीयता से उत्पन्न संभावित अवसरों को स्वीकार किया गया।
ब्रिक्स किस प्रकार बहुध्रुवीयता को मजबूत कर सकता है?

यह समझना आवश्यक है कि ब्रिक्स के सभी सदस्यों की आर्थिक तथा सुरक्षा संबंधी प्राथमिकताएँ समान नहीं हैं। इसलिए यह मंच बहुध्रुवीयता की संभावनाओं को आगे बढ़ाता है, लेकिन अपने आप में किसी एकीकृत वैश्विक राजनीतिक शक्ति का निर्माण नहीं करता।
इसके अतिरिक्त भारत, ब्राजील तथा दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के व्यापक पश्चिमी आर्थिक संबंधों को देखते हुए ब्रिक्स को अनिवार्य रूप से पश्चिम-विरोधी गठबंधन मानना भी सही नहीं होगा।
11. बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका
भारत की विदेश नीति में बहुध्रुवीयता का महत्त्व विशेष रूप से बढ़ा है।
12 फरवरी 2026 को राज्यसभा में विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि रणनीतिक स्वायत्तता भारतीय विदेश नीति का एक महत्त्वपूर्ण तत्व है और भारत की विदेश नीति बहुध्रुवीय विश्व की आवश्यकताओं के अनुरूप कार्य करती है।
भारत की भूमिका के पाँच प्रमुख आधार
1. रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) :-भारत अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर विदेश नीति के निर्णय लेने पर बल देता है। इसका उद्देश्य किसी एक शक्ति या गठबंधन पर पूर्ण निर्भरता से बचना है।
2. बहु-संरेखण (Multi-alignment) :- भारत विभिन्न मुद्दों पर विभिन्न देशों तथा समूहों के साथ सहयोग करता है। उदाहरण के लिए क्वाड, ब्रिक्स, G20 और SCO में भारत की भागीदारी अलग-अलग कूटनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति करती है।
3. वैश्विक संस्थागत सुधार :- भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार, विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व और वैश्विक आर्थिक संस्थाओं के लोकतंत्रीकरण का समर्थन करता है।
4. ग्लोबल साउथ की आवाज : – भारत विकासशील देशों की समस्याओं, विशेषकर विकास वित्त, जलवायु न्याय, ऋण संकट, खाद्य सुरक्षा और तकनीकी उपलब्धता जैसे विषयों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत करता है।
5. आर्थिक एवं तकनीकी क्षमता :- भारत अपनी आर्थिक वृद्धि, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, अंतरिक्ष तकनीक, विनिर्माण और नवाचार के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय प्रभाव बढ़ाने की संभावनाएँ विकसित कर रहा है।
भारत के लिए प्रमुख चुनौतियाँ
भारत की बहुध्रुवीय विदेश नीति को प्रभावी बनाने के लिए चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा आयात निर्भरता, तकनीकी एवं रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, वैश्विक व्यापार की अनिश्चितता और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों का प्रबंधन महत्त्वपूर्ण रहेगा।
इस संदर्भ में भारत को एक तरफ प्रमुख शक्तियों के साथ सहयोग विकसित करना है, तो दूसरी ओर अपने निर्णयों की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुरक्षित रखना है।
12. बहुध्रुवीयता, बहुपक्षवाद और बहु-संरेखण में अंतर
| अवधारणा | अर्थ | मुख्य प्रश्न |
| बहुध्रुवीयता (Multipolarity) | विश्व में शक्ति अनेक केंद्रों के बीच वितरित होना | शक्ति किसके पास है? |
| बहुपक्षवाद (Multilateralism) | अनेक देशों द्वारा संस्थाओं और साझा नियमों के अंतर्गत सहयोग करना | देश मिलकर निर्णय कैसे लेते हैं? |
| बहु-संरेखण (Multi-alignment) | अलग-अलग देशों और समूहों के साथ मुद्दा-आधारित साझेदारी विकसित करना | कोई देश किसके साथ और क्यों सहयोग करता है? |
| रणनीतिक स्वायत्तता | विदेश नीति में स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता | निर्णय कितनी स्वतंत्रता से लिए जाते हैं? |
उदाहरण: विश्व में अमेरिका, चीन और भारत जैसी शक्तियों का उभार बहुध्रुवीयता से संबंधित है; G20 के माध्यम से सहयोग बहुपक्षवाद है; और भारत का ब्रिक्स तथा क्वाड दोनों में भाग लेना बहु-संरेखण का उदाहरण है।
13. एक संतुलित एवं न्यायसंगत बहुध्रुवीय व्यवस्था के निर्माण की दिशा
- एक प्रभावी और न्यायसंगत बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में व्यापक प्रतिनिधित्व, संयुक्त राष्ट्र चार्टर का सम्मान, विवादों का शांतिपूर्ण समाधान, विकासशील देशों की आर्थिक क्षमता में वृद्धि तथा तकनीकी एवं वित्तीय संसाधनों तक न्यायसंगत पहुँच आवश्यक है।
- इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन, महामारी, साइबर सुरक्षा और परमाणु जोखिम जैसी समस्याओं का समाधान शक्ति-प्रतिस्पर्धा के बजाय व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ही संभव है।
- संयुक्त राष्ट्र का Pact for the Future (2024) इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण नीतिगत संदर्भ प्रस्तुत करता है, क्योंकि इसमें वैश्विक शासन को अधिक समावेशी, प्रभावी और समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने पर बल दिया गया है।
14. निष्कर्ष
- बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था 21वीं शताब्दी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक है। यह वैश्विक शक्ति के वितरण में परिवर्तन के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, आर्थिक व्यवस्थाओं, तकनीकी नेतृत्व और कूटनीतिक संबंधों के नए स्वरूप को दर्शाती है।
- चीन और भारत जैसी उभरती शक्तियों का विकास, ब्रिक्स का विस्तार तथा ग्लोबल साउथ की बढ़ती सक्रियता इस संक्रमण के प्रमुख संकेत हैं। इसके बावजूद सैन्य और वित्तीय शक्ति में विद्यमान असमानताएँ तथा प्रमुख शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा यह दर्शाती हैं कि बहुध्रुवीय व्यवस्था अभी पूर्णतः स्थापित नहीं हुई है।
- अतः बहुध्रुवीयता का वास्तविक महत्त्व केवल अनेक शक्ति-केंद्रों के निर्माण में नहीं, बल्कि उनके बीच सहयोग, संतुलन, जवाबदेही एवं न्यायपूर्ण वैश्विक शासन स्थापित करने में निहित है।
15. बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World Order) : PYQ
1. UPSC Mains — PSIR Optional बहुध्रुवीयता एवं विश्व व्यवस्था : प्रत्यक्ष PYQ
- “भारत के लिए बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का अर्थ बहुध्रुवीय एशिया भी होगा।” टिप्पणी कीजिए। (2025 | प्रश्न 1 5(c) · 10 अंक)
- “विश्व की द्विध्रुवीय संरचना बहुध्रुवीय संरचना की तुलना में अधिक स्थिर होती है।” टिप्पणी कीजिए। (2022 | प्रश्न 2 1(d) · 10 अंक)
- बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के लाभों की पहचान कीजिए। (2019 | प्रश्न 3 3(b))
नई विश्व व्यवस्था एवं भारत की भूमिका : संबंधित PYQ
- “भारत ने हाल के समय में बहुपक्षीय संरेखण (Multi-alignment) को अपनाते हुए गुटनिरपेक्षता से दूरी बनाई है।” टिप्पणी कीजिए। (2024 | प्रश्न 4 8(c))
- वर्तमान समय में अमेरिकी प्रभुत्व के समक्ष विभिन्न बाधाओं का विवेचन कीजिए। इनमें से कौन-सी बाधाएँ भविष्य में अधिक महत्त्वपूर्ण हो सकती हैं?(2023 | प्रश्न 5 4(c))
- 21वीं शताब्दी में भारत की नई विश्व व्यवस्था संबंधी दृष्टि की चर्चा कीजिए। (2022 | प्रश्न 6 8(c))
- उभरती विश्व व्यवस्था को आकार देने में भारत की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (2020 | प्रश्न 7 8(c))
- भारत की नई विश्व व्यवस्था संबंधी परिकल्पना का मूल्यांकन कीजिए। (2019 | प्रश्न 8 8(a))
- नई विश्व व्यवस्था की परिकल्पना भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख उद्देश्य बनकर उभरी है। इस संबंध में भारत द्वारा की गई नीतिगत पहलों तथा चुनौतियों की चर्चा कीजिए। (2015 | प्रश्न 9 7(a) · 20 अंक)
2. UPSC Mains — GS Paper-II
- “उभरती वैश्विक व्यवस्था में भारत की नई भूमिका के कारण उत्पीड़ित और हाशिए पर स्थित राष्ट्रों के नेता के रूप में उसकी दीर्घकालीन छवि समाप्त हो गई है।” विस्तार से स्पष्ट कीजिए। (2019 | प्रश्न 10 15 अंक · 250 शब्द)
- पश्चिमी देश चीन की आपूर्ति शृंखला पर निर्भरता कम करने और चीन के राजनीतिक एवं आर्थिक प्रभुत्व का मुकाबला करने के लिए भारत को एक वैकल्पिक शक्ति एवं रणनीतिक सहयोगी के रूप में प्रोत्साहित कर रहे हैं। उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए। (2024 | प्रश्न 11 प्रश्न 9 · 10 अंक)
3. BPSC मुख्य परीक्षा — संबंधित PYQ
- 12वें BRICS शिखर सम्मेलन के प्रमुख उभरते मुद्दों—वैश्विक स्थिरता, साझा सुरक्षा तथा विकास के लिए नवाचारी वृद्धि—की व्याख्या कीजिए। (66वीं BPSC | प्रश्न 12 GS-I · 38 अंक)
- G-20 में भारत का नेतृत्व प्राचीन दर्शन ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के प्रति प्रतिबद्धता को किस प्रकार प्रतिबिंबित करता है? वैश्विक सहयोग एवं विकास में भारत की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए (69वीं BPSC | प्रश्न 13 GS-I · 38 अंक)
16. UPSC/BPSC मुख्य परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न
प्रश्न 1. “वर्तमान विश्व व्यवस्था एकध्रुवीयता से बहुध्रुवीयता की ओर संक्रमण के दौर से गुजर रही है।” समकालीन भू-राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिए। (250 शब्द | 15 अंक)
प्रश्न 2. बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था से क्या तात्पर्य है? इसके उदय के प्रमुख कारणों का उल्लेख करते हुए भारत के लिए उत्पन्न अवसरों एवं चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए।(250 शब्द | 15 अंक)
प्रश्न 3. “बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था आवश्यक रूप से अधिक शांतिपूर्ण एवं न्यायसंगत नहीं होती।” आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द | 15 अंक)
प्रश्न 4. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था किस प्रकार ग्लोबल साउथ के राजनीतिक और आर्थिक हितों को प्रभावित कर सकती है। (250 शब्द | 15 अंक)